Monday, 6 June 2011

उदासी

शहर की भीड़ बासी सी लगती है,गाँव की ख़ामोशी उदासी सी लगती है ,

जिन्दगी की भागमभाग में जिन्दगी बदहवासी सी लगती है ,
बढती भीड़ में अपनी मौजूदगी गुमशुदा सी लगती है ,
खुल कर जीने की तड़प में,हर जिम्मेदारी बेवजह सी लगती है ,
एक मंजिल तक पहुँच कर ,दुसरे मंजिल को पाने कि चाह में ,
मंजिलों की तादाद अच्छी खासी सी लगती है ,

इन्सान को इन्सान से ही है नफरत ,
इंसानियत की बात अब गुस्ताखी सी लगती है ,
स्वार्थ भरे माहौल में ,सामाजिक मुद्दों की बातें भी अब सियासी सी लगती है ,
आधुनिकता की अंधी दौड़ में ,पहाड़ों,पेड़ों की हवा भी जहरीली सी लगती है ,
प्रदुषण भरे वातावरण में ,अब तो नाश्ते में भी दवा लगती है ,
महंगाई और मिलावट ने, अंतर मिटा दिया गाँव और शहर का ,
स्वस्थ और लम्बी उम्र की कामना अब बददुआ सी लगती है ,
सुरक्षा की बात ना करो कही भी कुछ भी हो जाये ,
स्वर्गवास होने में अब कहाँ 'काशी' लगती है ,
                                               " कुमार "

आज मुझे राजनीती से नफरत हो गयी.

 आज मुझे राजनीती से नफरत हो गयी.मै समझता हूँ बहुत से लोग राजनीती पसंद नहीं करते,लेकिन  मै एक भारतीय हूँ.मुझे मेरा भारत पसंद है,इसीलिए मै भारत की राजनीती को भी पसंद करता हूँ.  इसीलिए भारत से जुडी हर चीज मुझे पसंद है.मै ये भी समझता हूँ की राजनीती गन्दी होती है ,लेकिन  मै ये भी जानता हूँ की अगर अच्छी राजनीती हो तो देश आगे बढता है,देश प्रगति करताहै, देशवासी  सुखी होते हैं.बस इसी अच्छी राजनीती के विश्वास पर ही मै राजनीती की तरफ आशावान नजरों से  भारत को लेकर देखता था.क्योंकि बिना लोकतंत्र की राजनीती से देश कार्यान्वित नहीं हो सकता, देश  नहीं चल सकता. इसीलिए सोचता था की एक जागरूक भारतीय नागरिक होने के नाते हमें राजनीती  से मुंह फेरने के बदले एक अच्छी राजनीती,देशनीति की तरफ हमेशा आशावान रहना चहिये. बस  यही एक विचार था जो मुझे अपने देश की राजनीती से जुड़ने की प्रेरणा देता था.लेकिन आज की  दुर्भाग्यपूर्ण घटना,आज की गन्दी राजनीती को देखकर,उसके एहशाश से भी मुझे घृणा हो गयी है.  आज मुझे राजनीती से नफरत हो गयी.

   मुझे किसी राजनितिक पार्टी से लगाव नहीं,लेकिन मै भारतीय राजनीती ,अपने देश की राजनीती में विश्वास  कर उससे प्यार करना चाहता हूँ,क्योंकि मुझे लगता है हम सब भारतवासी चाहते है के देश आगे बढे .किसी की  नक़ल करके नहीं,किसी के दिखावे को देखकर नही,बल्कि भारत विशुद्ध रूप से भारतीय बनकर,भारतवर्ष बन  कर आगे बढे.दुनिया में चमके .भारत एक ऐसा संपन्न देश बने जो आर्थिक ही नहीं, सामाजिक, पारिवारिक  और नैतिक मूल्यों में संपन्न हो कर दुनिया को राह दिखाए.सिर्फ ऐशो-आराम ही नहीं बल्कि अध्यात्मिक  मूल्यों में भी अग्रगण्य बने .
    एक ऐसा व्यक्ति जो सिर्फ व्यक्ति ही नहीं बल्कि हर भारतवासी की अभिव्यक्ति बनकर,उनकी जुबान बनकर,  भ्रस्टाचार के विरूद्ध मजबूत कानून लाने के लिए सत्याग्रह करता है .एक ऐसा व्यक्ति जो काले-धन के खिलाफ अनशन  करता है,वो धन जो हर भारतवासी की मेहनत की कमाई का हिस्सा है.वो धन जो अगर देश में वापस आ जाये  तो उससे बहुत से गाँव आदर्श-गाँव बन सकते है,इससे भारत को मजबूती मिलेगी.तो ये नेता उसके खिलाफ गन्दी राजनीती करते है,उन पर बलप्रयोग कर,उनका मजाक बनाते है.और दुसरे नेता,पार्टियाँ अपनी-अपनी  रोटियां सेकने के लिए आगे आ जाते हैं .
 मुझे लगता है की अब हर भारतवासी ये समझ गया होगा की ये नेता गन्दी राजनीती कैसे करते हैं.ये व्यक्ति  जनता  की बात लेकर इन नेताओं के सामने गए है,वो भी कोई नेता बनकर नहीं बल्कि एक भारतीय समाज  बनकर क्योंकि हर भारतवासी ये कहना चाहता है.हर भारतवासी ने भले नेता चुनकर दिए हों,लेकिन वो सब  गन्दी राजनीती के शिकार लगते है.इसीलिए हर भारतवासी नेता के बदले जननायक की उम्मीद कर रहा था जो उनकी बात सरकार तक पहुंचाए .अब अगर ये भारतवासी,हर भारतवासी की बात सरकार से करवाना चाहते है  तो ये नेता इसे समझने के बदले गन्दी राजनीती कर रहे है .
  मुझे लगता है की कैसे भी मजबूत जन -लोकपाल -बिल बन जाना चाहिए,कैसे भी कालाधन भारत में वापस  आ जाना चाहिए .
       क्योंकि ये किसी व्यक्ति की नहीं हर भारतवासी की मांग है.मै अगर एक जागरूक भारतीय और  भारतवासी होने के नाते अपना पक्ष रखू तो मुझे लगता है बस ये हो जाना चाहिए था.क्योंकी हम ये  उम्मीद कत्तई नहीं कर सकते की अगर मौजूदा सरकार ने ये काम नहीं किया तो कोई दूसरी सरकार ये  काम करेगी,क्योंकि वो भी गन्दी और स्वार्थी राजनीती करने से बाज नहीं आएगी.अगर ये काम हो  जाये तो मुझे लगता है के अभी से ही इन गंदे राजनीतिज्ञों का शुद्धिकरण होना चालू हो जायेगा,और  देश के लिए कुछ अच्छा हो जायेगा.इसलिए हर देशवासी अब येही चाहता है और येही चाहेगा की इन  सामाजिक और आर्थिक मूद्दों पर गन्दी राजनीती ना हो कर बस ये काम(जन -लोकपाल  -बिल,कालाधन) जल्दी से जल्दी हो जाये.क्योंकि अगर गन्दी राजनीती हुई और अगर ये काम अभी  ना हुआ तो शायद ये कभी ना हो ,या फिर साठ साल ना बीत जाये .........

Sunday, 22 May 2011

शराब-का-पैमाना

     शराब नहीं शराब की बू से नफरत है ,शराबियों के हजूम से नफरत है ,

     शराब के पैमाने से नहीं ,शराब के मैखाने से नफरत है ,
     शराब की खुमारी से नहीं , उसकी बीमारी से नफरत है ,

     शराब के साहिल पे बैठ कर पीने से नहीं ,
     शराब की महफीलों से नफरत है ,

     शराब के रोजगार से नहीं,
      उसके बढते व्यापार से,उसके इश्तिहार से नफरत है,

     दो घूँट पी कर चहकने से नहीं ,
     पूरी बोतल खाली कर बहकने से नफरत है ,

     प्यार में मिली बेरुखी हमें इतनी ,
     के सोचा बन जाये देवदास मगर ,

     देवदास की दीवानगी से नहीं मगर ,
     उसके शराब में डूब कर मर जाने से नफरत है.
                                                                         " कुमार "

Saturday, 14 May 2011

नेता

     नेता मतलब बिना पेंदी का लोटा ,

     जब मागना हो वोट
     तब सिर के बल लोटा ,

     जीत गया जब चुनाव
     तब फिर कभी नहीं लौटा ,

     खा गया जनता का पैसा
     तो फिर कभी न सका उसे वो लौटा ,

     झूठे वादे कर जनता से देते हैं ये धोखा ,
     जनता के पैसों को जोंक की तरह सोखा ,

     नेता के पिछवाड़े पे बरसाओ सोंटा ,

     फिर भी नेता कहते हम कभी नहीं सुधरेंगे
     चाहे इनपे लगाओ मकोका या पोटा,
                                                                                 " कुमार "



Tuesday, 10 May 2011

गाँव-शहर


     शहर में कितनी भीड़ -भाड़ है ,
     गाँव में सूनी पड़ी चौपाल है ,
     शहरों में कंक्रीटों का बढ रहा जंगल है ,
     गाँवों में पेड़ों की हो रही उमर कम है ,
     यहाँ ऊँची ईमारतों का जाल है , 
     गाँव में वही घास -फूस की छत और पुआल है ,
     गाँव कहते किसे है ,जहाँ किसान रहते है! ,
     जमींदार जो थे वो तो कब के चल गए ,
     शहरों-कस्बों में आके दलाल बन गए ,
     दलाल बन के और मालामाल हो गए ,
     किसान ,किसान अब भी वहीं है ,
     अपने खून पसीने से सींच रहा जमीं है ,
     किसान की औलादें अब नहीं बनना चाहते किसान ,
     वो अब उनके खलिहानों में बस बनाते हैं  मकान ,
     या फिर करतें हैं गाँव से पलायन ,
     शहरों की चका-चौंध में ढूंढ़ते है जीवन ,
     शहरों में ही क्यूँ अमीरी का बोलबाला है ,
     गरीबी और क़र्ज़ ने क्यूँ किसानो को दबा डाला है?
     सुविधा,सम्पन्नता,समृधी कब किसानों के कदम चूमेगी ,
      हमारी सरकारों के कानो में कब इस बात की जूं रेंगेगी.

                                                                  " कुमार "

Saturday, 9 April 2011

मेरा भारत


     ये भी भारत है ,वो भी भारत है ..

     ये प्रगतीसील भारत है ,वो प्रगति की राह देखता भारत है ,
     ये उच्च-मध्यम भारत है ,वो निम्न-मध्यम भारत है ,

     ये शहरों को शंघाई बनाने का सपना देखता भारत है ,
     वो एक मजबूत पक्की सड़क बनने की राह देखता भारत है ,

     ये जनता के पैसों को भ्रस्टाचार करके स्विस बैंकों में जमा करने वाला भारत है ,
     वो अपनी जमीन-खेतों जंगलों को बचाने के लिए नक्सलवादी की राह पर जाने वाला भारत है ,

     ये कोम्मन्वेअल्थ में भ्रस्टाचार करने वालों की मिली-भगत का भारत है ,
     वो देश का नाम रोशन करने वाले सारे खिलाडियों का भारत है ,

     ये किसी विदेशी को ससम्मान आलाकमान बनाकर चलाने वाला भारत है ,
     वो अपने ही देश में प्रांतवाद ,भाषावाद के नाम पर तिरस्कार पाने वाला भारत है ,

     ये किसी बुजुर्ग(हजारे जी) के, देश को फिर से गाँधी के उसूलों से युवा बनाने वाला भारत है ,
     वो गाँधी को भी देश के विभाजन की त्रासदी का जिम्मेदार बताने वाला भारत है ,

     ये विभिन्न भाषावों,धर्मों, रीती-रिवाजों,संस्कारों का भारत है ,
     वो विभिन्नताओं में भी एकता रखने वाला भारत है,

     ये मेरा भारत है ,वो मेरा भारत है ,
     ये महान भारत है ,मेरी दिलो-जान भारत है ,
     मेरा ईमान भारत है ,मेरी पहचान भारत है ,
                                                                                                   " कुमार  "